The art of Mithila, skill of artisans.

About Mithila/Madhubani Painting

Mithila Painting a Canvas of Tradition Originating from the ancient Mithila region of Bihar and Nepal, Mithila painting (also known as Madhubani art) is a vibrant tapestry of culture and devotion. Legend has it that this art form dates back to the time of the Ramayana, when King Janaka commissioned artists to capture the wedding of his daughter, Sita, to Lord Rama. Historically practiced by women on the freshly plastered mud walls of their homes during festivals and weddings, this tradition has evolved from ephemeral wall art to a globally recognized form on handmade paper and canvas. It is more than just decoration; it is a prayer, a meditation, and a celebration of nature, portraying deities, mythology, and daily village life with reverence.

मिथिला पेंटिंग (मधुबनी कला) बिहार और नेपाल के प्राचीन मिथिला क्षेत्र की एक अद्वितीय लोक कला है, जिसे लगभग 2500 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक एवं कलात्मक परंपरा माना जाता है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत रामायण काल में हुई, जब मिथिला के राजा जनक ने अपनी पुत्री माता सीता और भगवान श्रीराम के विवाह के शुभ अवसर को चित्रों के माध्यम से अंकित करने के लिए कलाकारों को आमंत्रित किया था। प्राचीन समय में यह कला महिलाओं द्वारा अपने घरों की मिट्टी से लीपी हुई दीवारों और आँगनों पर विवाह, पर्व-त्योहारों तथा अन्य शुभ अवसरों पर बनाई जाती थी। समय के साथ यह परंपरा दीवारों से निकलकर हस्तनिर्मित कागज़, कैनवास, वस्त्र और अन्य माध्यमों तक पहुँची तथा आज विश्वभर में भारतीय लोक कला की एक विशिष्ट पहचान बन चुकी है। मिथिला पेंटिंग केवल सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना की अभिव्यक्ति है। इसके चित्रों में देवी-देवता, रामायण और महाभारत की कथाएँ, सूर्य, चंद्रमा, मछली, मोर, वृक्ष, फूल-पत्तियाँ तथा ग्रामीण जीवन के दृश्य अत्यंत सुंदर और प्रतीकात्मक शैली में अंकित किए जाते हैं। प्रत्येक चित्र शुभता, समृद्धि, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। आज लगभग 2500 वर्ष पुरानी यह अमूल्य कला परंपरा भारत की सांस्कृतिक विरासत का गौरवपूर्ण प्रतीक है और विश्वभर में अपनी मौलिकता, सुंदरता तथा आध्यात्मिक भाव के लिए सराही जाती है।

1. भरनी शैली (Bharni Style)

इस शैली में चमकीले और गहरे रंगों का भरपूर उपयोग किया जाता है। देवी-देवताओं, धार्मिक कथाओं और पौराणिक प्रसंगों का चित्रण इसकी प्रमुख विशेषता है। यह मधुबनी चित्रकला की सबसे लोकप्रिय शैलियों में से एक है।

मिथिला (मधुबनी) चित्रकला के प्रमुख प्रकार

मिथिला चित्रकला अपनी विशिष्ट शैली, रंगों और विषय-वस्तु के आधार पर कई प्रकारों में विभाजित की जाती है। प्रत्येक शैली की अपनी अलग पहचान और सांस्कृतिक महत्ता है।

2. कचनी शैली (Kachni Style)

कचनी शैली में रंगों की अपेक्षा बारीक रेखाओं और सूक्ष्म पैटर्न का अधिक उपयोग होता है। हैचिंग (Hatching) और क्रॉस-हैचिंग तकनीक से चित्रों को गहराई और सुंदरता प्रदान की जाती है।

3. तांत्रिक शैली (Tantrik Style)

इस शैली में देवी-देवताओं के तांत्रिक स्वरूपों तथा धार्मिक प्रतीकों का चित्रण किया जाता है। काली, दुर्गा, महाकाली, दशमहाविद्या, शिव और अन्य देवी-देवताओं के चित्र प्रमुख विषय होते हैं।

4. कोहबर शैली (Kohbar Style)

कोहबर शैली विवाह और शुभ अवसरों से जुड़ी होती है। इसमें कमल, बाँस, मछली, पक्षी, सूर्य, चंद्रमा और दंपति के जीवन में सुख, समृद्धि तथा उर्वरता के प्रतीकों का चित्रण किया जाता है।

5. गोदना शैली (Godna Style)

यह शैली पारंपरिक गोदना (टैटू) कला से प्रेरित है। इसमें ज्यामितीय आकृतियाँ, बिंदु, रेखाएँ और सरल डिज़ाइन बनाए जाते हैं। इसकी सादगी और प्रतीकात्मकता इसे विशेष बनाती है।
लगभग 2500 वर्ष पुरानी मिथिला (मधुबनी) चित्रकला की समृद्ध परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अनेक महान कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन कलाकारों ने अपनी अद्वितीय कला, समर्पण और सृजनशीलता के माध्यम से इस लोककला को विश्वभर में सम्मान दिलाया।
                                                                                           प्रमुख कलाकार
  • जगदंबा देवी (1975): मिथिला चित्रकला के लिए पद्मश्री प्राप्त करने वाली पहली कलाकार, जिन्होंने पारंपरिक दीवार चित्रों को कागज़ और कैनवास पर नई पहचान दिलाई।
  • सीता देवी (1981): अपनी विशिष्ट शैली और आकर्षक रंगों के माध्यम से मिथिला चित्रकला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने वाली प्रसिद्ध कलाकार।
  • गंगा देवी (1984): अपनी अनूठी कथात्मक शैली और रचनात्मक चित्रों के माध्यम से मधुबनी चित्रकला को नई दिशा देने वाली महान कलाकार।
  • महासुंदरी देवी (2011): तांत्रिक एवं कोहबर शैली की अद्भुत विशेषज्ञ, जिन्होंने पारंपरिक मिथिला कला के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • बऊआ देवी (2017): भरनी और कोहबर शैली की प्रामाणिक परंपरा को संरक्षित करते हुए अपनी कला का विश्वभर में प्रदर्शन करने वाली प्रसिद्ध कलाकार।
  • गोदावरी दत्ता (2019): कचनी शैली की बारीक रेखांकन कला की विशेषज्ञ, जिन्होंने दशकों तक भारत और विदेशों में मिथिला चित्रकला का प्रशिक्षण एवं प्रचार किया।
  • दुलारी देवी (2021): संघर्षपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेकर अपनी जीवंत चित्रशैली के माध्यम से मिथिला कला को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाली कलाकार।
  • शांति देवी (2024): शिवन पासवान के साथ पारंपरिक गोदना शैली की मिथिला चित्रकला के संरक्षण और संवर्धन के लिए सम्मानित प्रतिष्ठित कलाकार।
    इन महान कलाकारों के अथक प्रयासों के कारण मिथिला (मधुबनी) चित्रकला आज भारत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विश्वभर में सम्मानित है। उनकी कलाकृतियाँ केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा, आध्यात्मिकता और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान की भी अभिव्यक्ति हैं। आज भी नई पीढ़ी के कलाकार इन्हीं महान विभूतियों से प्रेरणा लेकर इस अमूल्य कला परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
मिथिला (मधुबनी) चित्रकला के महान कलाकार

उपेंद्र महारथी शिल्प एवं अनुसंधान संस्थान, पटना में मेरे गुरु (प्रशिक्षक) महानमा देवी (राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त) एवं अशोक पासवान सर (राज्य पुरस्कार प्राप्त) के साथ I

Founder Artist

Empowering local artisans through sustainable practices.

संस्थापक : माधुरी झा बिहार के पटना की एक समर्पित मधुबनी (मिथिला) चित्रकला कलाकार हैं। उनका मूल निवास बिहार के सीतामढ़ी जिले में है, जो मिथिला संस्कृति और लोककला की समृद्ध परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। सदियों पुरानी मिथिला चित्रकला परंपरा से गहराई से जुड़ी उनकी कलाकृतियाँ सांस्कृतिक प्रतीकों, सूक्ष्म रेखांकन और संतुलित संरचनाओं का सुंदर संगम प्रस्तुत करती हैं। प्रकृति, भारतीय पौराणिक कथाओं और ग्रामीण जीवन से प्रेरित होकर वे हस्तनिर्मित चित्रों का सृजन करती हैं, जो सौहार्द, समृद्धि और आध्यात्मिक गहराई का संदेश देते हैं। आर्टिसन मिथिला के माध्यम से माधुरी झा का उद्देश्य मधुबनी चित्रकला की प्रामाणिकता को संरक्षित रखना तथा उसे आधुनिक घरों, कार्यालयों और वैश्विक दर्शकों के लिए एक परिष्कृत और समकालीन रूप में प्रस्तुत करना है। उनकी प्रत्येक कलाकृति भारतीय सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक सौंदर्य और लोककला की जीवंत आत्मा को अभिव्यक्त करती है।

Founder : Madhuri Jha is a dedicated Madhubani painting artist based in Patna, Bihar. She specializes in the intricate and symbolic Godhna style, known for its bold lines, repetitive patterns, and deep cultural roots inspired by traditional tattoo art.
Madhuri is a proud student of National Awardee Mahanama Devi of Jitwarpur, Madhubani, one of the most respected centers of authentic Madhubani art. Under her guidance, she has refined her skills while preserving the purity and heritage of this centuries-old tradition. Through her artwork, Madhuri Jha aims to promote Bihar’s rich cultural heritage and bring the timeless beauty of Madhubani art to contemporary audiences across India and beyond.

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